Article summary
Abstract
सतत विकास लक्ष्य ;ैनेजंपदंइसम क्मअमसवचउमदज ळवंसे. ैक्ळेद्ध इक्कीसवीं शताब्दी के वैश्विक विकास विमर्श
की सबसे व्यापक एवं समावेशी अवधारणा के रूप में स्थापित हुए हैं। वर्ष 2015 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा
स्वीकृत ‘2030 एजेंडा फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट’ के अंतर्गत निर्धारित 17 लक्ष्य एवं 169 उपलक्ष्य ऐसे विकास
मॉडल का प्रतिपादन करते हैं, जिसमें आर्थिक प्रगति, सामाजिक न्याय तथा पर्यावरणीय संतुलन को परस्पर पूरक
तत्वों के रूप में स्वीकार किया गया है। भारत ने इन लक्ष्यों को राष्ट्रीय विकास रणनीति के साथ समन्वित करते
हुए गरीबी उन्मूलन, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, लैंगिक समानता, स्वच्छ जल एवं स्वच्छता, सम्मानजनक रोजगार,
जलवायु कार्रवाई तथा संस्थागत सुदृढ़ीकरण जैसे क्षेत्रों में अनेक नीतिगत एवं कार्यक्रमगत पहलें प्रारम्भ की हैं।
इस व्यापक विकास प्रक्रिया में ग्रामीण भारत की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि देश की बड़ी जनसंख्या
आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है और कृषि, प्राकृतिक संसाधन, खाद्य सुरक्षा तथा स्थानीय अर्थव्यवस्था
का प्रमुख आधार ग्रामीण समाज ही है। पिछले एक दशक में भारत सरकार द्वारा स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण),
जल जीवन मिशन, प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण), महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम
(मनरेगा), दीनदयाल अंत्योदय योजना, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन, प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि तथा
डिजिटल इंडिया जैसी अनेक योजनाओं के माध्यम से ग्रामीण विकास को नई दिशा प्रदान करने का प्रयास किया
गया है। नीति आयोग द्वारा प्रकाशित ैक्ळ प्दकपं प्दकमग के अनुसार अधिकांश राज्यों में स्वास्थ्य, स्वच्छता, विद्युत
उपलब्धता, वित्तीय समावेशन तथा संस्थागत सेवाओं तक पहुँच में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। वहीं दूसरी ओर,
बहुआयामी गरीबी, जलवायु परिवर्तन, कृषि आय की अनिश्चितता, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं तक
असमान पहुँच, लैंगिक विषमता, डिजिटल विभाजन तथा क्षेत्रीय विकास असंतुलन जैसी चुनौतियाँ अभी भी सतत
विकास की गति को प्रभावित कर रही हैं।