Article summary
Abstract
भारतीय शिक्षा परम्परा का आधार केवल ज्ञानार्जन नहीं, बल्कि व्यक्ति के बौद्धिक, नैतिक, आध्यात्मिक,
सामाजिक एवं व्यावहारिक विकास में निहित रहा है। वेद, उपनिषद, योग, न्याय और वेदांत जैसे भारतीय दर्शन
आत्मबोध, तर्क, अनुशासन, सदाचार, सत्यनिष्ठा तथा प्रकृति और समाज के साथ संतुलित जीवन पर बल देते
हैं। इसके विपरीत, आधुनिक शिक्षा व्यवस्था मुख्यतः वैज्ञानिक दृष्टिकोण, तकनीकी दक्षता, कौशल विकास,
रोजगारपरकता तथा वैश्विक प्रतिस्पर्धा की आवश्यकताओं पर केंद्रित है। प्रस्तुत आलेख में परम्परागत भारतीय
ज्ञान और वर्तमान शिक्षा प्रणाली का तुलनात्मक अध्ययन करते हुए दोनों की विशेषताओं, शिक्षण पद्धतियों, मूल्यों,
पाठ्यचर्या तथा उद्देश्यों का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि परम्परागत ज्ञान चरित्र
निर्माण, नैतिकता, आत्मानुशासन और जीवन-दृष्टि को विकसित करता है, जबकि आधुनिक शिक्षा वैज्ञानिक
चिंतन, नवाचार, तकनीकी क्षमता और समस्या-समाधान कौशल को प्रोत्साहित करती है। दोनों प्रणालियों को
एक-दूसरे के विरोधी रूप में देखने के स्थान पर उनके समन्वय की आवश्यकता है। आधुनिक तकनीक,
डिजिटल संसाधनों और प्रयोगात्मक शिक्षण के साथ भारतीय दार्शनिक मूल्यों को जोड़कर शिक्षा को अधिक
मानवीय, संतुलित और जीवनोपयोगी बनाया जा सकता है। ऐसा समन्वित शिक्षा मॉडल विद्यार्थियों में वैज्ञानिक
चेतना के साथ सांस्कृतिक आत्मबोध, सामाजिक उत्तरदायित्व, नैतिक विवेक और समग्र व्यक्तित्व का विकास
करने में सहायक सिद्ध होगा।