Article summary
Abstract
वर्तमान समय में कृषि क्षेत्र अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग ने मिट्टी की उर्वरता, जल की गुणवत्ता, जैव विविधता तथा मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है। कृषि उत्पादन को बढ़ाने की होड़ में प्राकृतिक संसाधनों का असंतुलित दोहन किया गया, जिसके परिणामस्वरूप पर्यावरणीय संकट गहराता गया। ऐसी परिस्थितियों में जैविक खेती एक वैकल्पिक और टिकाऊ कृषि प्रणाली के रूप में उभरकर सामने आई है। जैविक खेती न केवल पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देती है, बल्कि किसानों की आर्थिक स्थिति, सामाजिक विकास तथा उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य को भी सकारात्मक रूप से प्रभावित करती है। यह शोध लेख सतत कृषि विकास में जैविक खेती के योगदान का विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इसमें जैविक खेती की अवधारणा, सिद्धांत, आवश्यकता, लाभ, चुनौतियाँ तथा भारत में इसके विकास की संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा की गई है। अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि जैविक खेती मिट्टी की गुणवत्ता को बनाए रखने, जल संरक्षण, जैव विविधता को सुरक्षित रखने तथा ग्रामीण रोजगार सृजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसके अतिरिक्त, यह जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में भी सहायक है। हालांकि जैविक खेती के समक्ष उत्पादन में कमी, प्रमाणन प्रक्रिया की जटिलता, बाजार तक सीमित पहुँच तथा किसानों में जागरूकता की कमी जैसी समस्याएँ विद्यमान हैं। उचित सरकारी नीतियों, प्रशिक्षण, अनुसंधान तथा विपणन सुविधाओं के माध्यम से इन चुनौतियों का समाधान किया जा सकता है।