Article summary
Abstract
हिंदी साहित्य में किन्नर-विमर्श ने पिछले दो दशकों में एक महत्त्वपूर्ण विमर्शात्मक धारा के रूप में अपनी
पहचान स्थापित की है। नीरजा माधव का उपन्यास ‘यमदीप’ किन्नर समुदाय के सामाजिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक
और सांस्कृतिक जीवन को केंद्र में रखकर रचित एक उल्लेखनीय कृति है। वर्ष 2002 में प्रकाशित इस उपन्यास
को हिंदी का प्रथम किन्नर-केंद्रित उपन्यास माना जाता है। उपन्यास की कथा एक मेजर के घर जन्मी तीसरी
संतान ‘नंदरानी’ के जीवन-संघर्ष पर आधारित है, जिसे परिवार द्वारा त्याग दिए जाने के बाद किन्नर समुदाय
में ‘नाजबीबी’ के रूप में नया जीवन प्राप्त होता है। उपन्यास में नाजबीबी के माध्यम से किन्नरों की सामाजिक
उपेक्षा, पारिवारिक बहिष्कार, आर्थिक विवशता, मानसिक पीड़ा, सांस्कृतिक परंपराओं तथा आत्मसम्मान की
आकांक्षा का अत्यंत संवेदनशील चित्रण किया गया है। ‘नाजबीबी’ और ‘सोना’ के संबंधों में किन्नर समुदाय की
ममता, प्रेम और मानवीय संवेदनाएँ अभिव्यक्त होती हैं, जबकि ‘मानवी’ के चरित्र के माध्यम से स्त्री-संघर्ष और
पितृसत्तात्मक व्यवस्था की विसंगतियो ं को उजागर किया गया है। उपन्यास समाज, धर्म, राजनीति, पुलिस-प्रशासन,
मीडिया और स्वयंसेवी संस्थाओं के दोहरे चरित्र पर भी प्रश्न उठाता है।
उपन्यास के अंत में नाजबीबी का राजनीति में प्रवेश करने का संकल्प किन्नर समुदाय के आत्मसम्मान,
अधिकार-बोध और सामाजिक स्वीकृति की आकांक्षा का प्रतीक है। इस प्रकार ‘यमदीप’ किन्नर जीवन की
त्रासदी, संघर्ष और संभावनाओं को प्रस्तुत करते हुए समाज को संवेदनशील, समावेशी और मानवीय दृष्टिकोण
अपनाने के लिए प्रेरित करता है।