Article summary
Abstract
हिंदी कथा साहित्य में स्त्री कथाकारों की भूमिका और योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। प्रारंभिक दौर से लेकर वर्तमान समय तक स्त्री लेखन ने सामाजिक यथार्थ को अपनी विशिष्ट दृष्टि से देखा और प्रस्तुत किया है। स्त्रियाँ न केवल अपने अस्तित्व की पहचान के लिए संघर्ष करती रहीं, बल्कि उन्होंने साहित्य के माध्यम से सामाजिक विडंबनाओं, स्त्री पीड़ा, अकेलेपन और सांस्कृतिक जटिलताओं को स्वर दिया। बंग महिला की कहानी ‘दुलाईवाली’ को हिंदी कथा साहित्य में स्त्री विमर्श की नींव के रूप में स्वीकारा जाता है, जिसमें स्त्री के अकेलेपन और सामाजिक उपेक्षा को मार्मिकता से उभारा गया है। यह कथा स्त्री की उस चुप पीड़ा की ओर संकेत करती है जिसे समाज पहचान तो लेता है, पर सहारा नहीं देता। हिंदी कथा साहित्य में स्त्री कथाकारों ने सामासिक संस्कृति के भीतर अपने अनुभवों और चिंताओं को स्थान देते हुए, स्त्री चेतना और आत्माभिव्यक्ति की सशक्त धारा प्रवाहित की है।