Article summary
Abstract
दलित साहित्य भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण धारा है, जो सदियों से उपेक्षित और शोषित दलित समुदाय की पीड़ा, संघर्ष और अस्मिता को केंद्र में रखता है। दलित कहानियाँ इस साहित्य की प्रमुख विधा हैं, जो स्वानुभूति पर आधारित यथार्थ चित्रण करती हैं। दलित कहानियों का स्वरूप मुख्य रूप से प्रतिरोध, विद्रोह और सामाजिक समानता की आकांक्षा से निर्धारित होता है। यह साहित्य न केवल दलितों के भोगे हुए यथार्थ को उजागर करता है, बल्कि जातिवादी व्यवस्था के विरुद्ध एक सशक्त आवाज भी बनता है। ओमप्रकाश वाल्मीकि, मोहनदास नैमिशराय, रत्नकुमार सांभरिया जैसे कहानीकारों की रचनाओं में यह स्वरूप स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।