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Abstract
-: पेरियार ई. वी. रामासामी दक्षिण भारत के प्रख्यात समाज सुधारक, चिंतक और ष्आत्मसम्मान आंदोलनष् के जनक थे। उनका समाज दर्शन तर्क, समानता, सामाजिक न्याय और अंधविश्वासों के विरोध पर आधारित था। पेरियार ने जाति-व्यवस्था, पितृसत्ता और धार्मिक रूढ़ियों को भारतीय समाज की प्रगति में प्रमुख बाधा माना। वे ब्राह्मणवादी वर्चस्व के घोर विरोधी थे और शिक्षा, समान अवसर तथा तर्कसंगत विचार को समाज परिवर्तन का आधार मानते थे। उनके विचारों में बौद्ध और चार्वाक दर्शन की तर्कशीलता तथा आधुनिक मानवतावाद का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि मनुष्य की असमानता का मूल कारण धर्म और जाति आधारित भेदभाव है, जिसे समाप्त करना आवश्यक है। स्त्री मुक्ति पर पेरियार का दृष्टिकोण अत्यंत प्रगतिशील था, उन्होंने स्त्रियों के शिक्षा, विवाह, संपत्ति के अधिकार और समान सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए आवाज उठाई। समीक्षात्मक दृष्टि से देखा जाए तो पेरियार का समाज दर्शन सामाजिक क्रांति की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था। उन्होंने समाज में चेतना जगाई, परंतु उनके कुछ विचार अत्यधिक कट्टर और धार्मिक संस्थाओं के प्रति नकारात्मक भी माने गए। धर्म के पूर्ण त्याग की उनकी अवधारणा कई लोगों को अतिवादी लगी। फिर भी, उनका उद्देश्य समाज को समानता, न्याय और तर्क पर आधारित बनाने का था। पेरियार का समाज दर्शन आज भी सामाजिक समरसता, नारी सशक्तिकरण और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के लिए प्रेरणा देता है। उन्होंने भारत में सामाजिक सुधार आंदोलन को एक नई दिशा दी, जिससे आधुनिक भारत में समानता और मानवाधिकारों की चेतना को बल मिला। इस प्रकार, पेरियार का चिंतन भारतीय समाज को आत्मसम्मान, तर्क और सामाजिक न्याय की राह पर अग्रसर करने वाला युगांतकारी दर्शन सिद्ध हुआ।