ISSN (O): 3048-7331Frequency: MonthlyLanguages: MultilanguageDOI Prefix: 10.70650
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शोधार्थिनी, हिन्दी विभाग, जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर (म0प्र0) डॉ0 अलका मौय, शोध निर्देशिका, प्राध्यापिका, हिन्दी विभाग, शासकीय कमलाराजा कन्या स्नातकोत्तर स्वशीसी महाविद्यालय, ग्वालियर (म0प्र0) DOI: 10.70650/rvimj.2025v2i100006 DOI URL: https://doi.org/10.70650/rvimj.2025v2i100006 Published Date: 03-10-2025 Issue: Vol. 2 No. 10 (2025): October 2025 Published Paper PDF: Download सारांश: लोकगीतों में मानव जीवन का स्वाभाविक स्वरूप स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है। उनके जीवन के सुख-दुःख, आशा-निराशा, पीड़ा-वेदना, इच्छा-कामना, हर्ष-उल्लास आदि बड़े ही मार्मिक व मधुर, सरल, सजीव भाव से दिखायी पड़ते हैं। लोकगीत के इन्हीं सजीवता, सरलता, मधुरता, स्वाभाविकता एवं संगीतात्मकता का जो गुण होता है वही गुण वास्तव में साधारणजन के जीवन में निहित रहता है तथा उनके जीवनचर्या का गुण भी होता है। साधारण जीवनयापन करने वाले लोगों के जीवन में जो भी भावनाएं उनके हृदय में हिलोरे मारती हैं उन्हें वह लोकगीतों के माध्यम से वैसे ही प्रस्तुत करते हैं, जैसे उनके वास्तविक जीवन में घटित होते हैं। मूलरूप से लोकगीत मानव के भावनाओं और क्रियाओं से संबंधित होते हैं। मानव के जीवन के उन सभी सूक्ष्म से सूक्ष्म भावनाओं की निरंतर बहने वाली धारा लोकगीत का रूप धारण कर लेती है। उस सागर रूपी लोकगीत में मिलने वाली भावनाओं के बूंद जब स्वर, लय, ताल, शब्द को संजोंकर छलकती हैं तो उसका साधारणजन रसपान करता है, वही लोकगीत है। इस तरह की प्रवृत्ति, भावना तथा प्राकृतिक सम्पदा की सहयोग करने वाले लोकगीतों को केवल रूप, आकार के आधार पर उन्हें वर्गो में बाँटना हल नहीं हो सकता। क्योंकि वर्तमान में जितने भी विद्वानों ने लोकगीतों के वर्गीकरण का प्रयास किया है, वह बाहरी आवरण और दूरदृष्टि पर ही आध् ाारित हैं। लोकगीतों की मूल भावना, प्राकृतिक परिवेश को समझ कर, उन्हें ऐसे बाँटा जाय जो मानव जीवन के विविधता और सम्पूर्णता को अपने में समाहित करती हैं। ग्रामीण समाज में अधिकतर किसान व मजदूर सम्मलित हैं। खेती-किसानी से थक हार कर आते हैं। मनोरंजन के साधन वह अपनी थकान मिटाने के लिए खोजते हैं उनको नाटकों का आसरा मिलना दिन भर की मजूदरी मिलने के बराबर होता हैं। तीज त्यौहार के साथ-साथ समाज में कई रीति-रिवाजों का होना रहता है। विभिन्न रिवाजों के साथ वर्ष भर कर्तव्य व जिम्मेदारियाँ निभानी होती हैं। विवाह को लेकर भी समाज में लोग गंभीरता से सोचते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों मंे विवाह एक घर में हो तो भी पूरा गाँव खुशी मानता है। इनके बीच पूरे समाज में शुभ अवसरों की हलचल मची रहती है। ये खुशी के पल सभी मनुष्यों के जीवन में आते हैं। इन पलों को जीने के लिए मनुष्य जीवन की रेस में सम्मिलित है। नाट्य कला विवाह संस्कार में रोचकता पैदा करने मं मददगार होती है। रावला नृत्य कला बुन्देखण्ड के ग्रामीण क्षेत्रों में निम्न जातियों के लिए तो सिर मौर है रावला नाट्य का आयोजन कर वह अपना मनोरंजन करने में सफल होते हैं।

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  • शोधार्थिनी, हिन्दी विभाग, जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर (म0प्र0) डॉ0 अलका मौय, शोध निर्देशिका, प्राध्यापिका, हिन्दी विभाग, शासकीय कमलाराजा कन्या स्नातकोत्तर स्वशीसी महाविद्यालय, ग्वालियर (म0प्र0) DOI: 10.70650/rvimj.2025v2i100006 DOI URL: https://doi.org/10.70650/rvimj.2025v2i100006 Published Date: 03-10-2025 Issue: Vol. 2 No. 10 (2025): October 2025 Published Paper PDF: Download सारांश: लोकगीतों में मानव जीवन का स्वाभाविक स्वरूप स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है। उनके जीवन के सुख-दुःख, आशा-निराशा, पीड़ा-वेदना, इच्छा-कामना, हर्ष-उल्लास आदि बड़े ही मार्मिक व मधुर, सरल, सजीव भाव से दिखायी पड़ते हैं। लोकगीत के इन्हीं सजीवता, सरलता, मधुरता, स्वाभाविकता एवं संगीतात्मकता का जो गुण होता है वही गुण वास्तव में साधारणजन के जीवन में निहित रहता है तथा उनके जीवनचर्या का गुण भी होता है। साधारण जीवनयापन करने वाले लोगों के जीवन में जो भी भावनाएं उनके हृदय में हिलोरे मारती हैं उन्हें वह लोकगीतों के माध्यम से वैसे ही प्रस्तुत करते हैं, जैसे उनके वास्तविक जीवन में घटित होते हैं। मूलरूप से लोकगीत मानव के भावनाओं और क्रियाओं से संबंधित होते हैं। मानव के जीवन के उन सभी सूक्ष्म से सूक्ष्म भावनाओं की निरंतर बहने वाली धारा लोकगीत का रूप धारण कर लेती है। उस सागर रूपी लोकगीत में मिलने वाली भावनाओं के बूंद जब स्वर, लय, ताल, शब्द को संजोंकर छलकती हैं तो उसका साधारणजन रसपान करता है, वही लोकगीत है। इस तरह की प्रवृत्ति, भावना तथा प्राकृतिक सम्पदा की सहयोग करने वाले लोकगीतों को केवल रूप, आकार के आधार पर उन्हें वर्गो में बाँटना हल नहीं हो सकता। क्योंकि वर्तमान में जितने भी विद्वानों ने लोकगीतों के वर्गीकरण का प्रयास किया है, वह बाहरी आवरण और दूरदृष्टि पर ही आध् ाारित हैं। लोकगीतों की मूल भावना, प्राकृतिक परिवेश को समझ कर, उन्हें ऐसे बाँटा जाय जो मानव जीवन के विविधता और सम्पूर्णता को अपने में समाहित करती हैं। ग्रामीण समाज में अधिकतर किसान व मजदूर सम्मलित हैं। खेती-किसानी से थक हार कर आते हैं। मनोरंजन के साधन वह अपनी थकान मिटाने के लिए खोजते हैं उनको नाटकों का आसरा मिलना दिन भर की मजूदरी मिलने के बराबर होता हैं। तीज त्यौहार के साथ-साथ समाज में कई रीति-रिवाजों का होना रहता है। विभिन्न रिवाजों के साथ वर्ष भर कर्तव्य व जिम्मेदारियाँ निभानी होती हैं। विवाह को लेकर भी समाज में लोग गंभीरता से सोचते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों मंे विवाह एक घर में हो तो भी पूरा गाँव खुशी मानता है। इनके बीच पूरे समाज में शुभ अवसरों की हलचल मची रहती है। ये खुशी के पल सभी मनुष्यों के जीवन में आते हैं। इन पलों को जीने के लिए मनुष्य जीवन की रेस में सम्मिलित है। नाट्य कला विवाह संस्कार में रोचकता पैदा करने मं मददगार होती है। रावला नृत्य कला बुन्देखण्ड के ग्रामीण क्षेत्रों में निम्न जातियों के लिए तो सिर मौर है रावला नाट्य का आयोजन कर वह अपना मनोरंजन करने में सफल होते हैं।

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