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मौर्यकालीन शासन व्यवस्थाः एक विश्लेषणात्मक अध्ययन

Author(s): डॉ0 रूबी कुमारी, सहायक प्राध्यापक (अतिथि), इतिहास विभाग, रमेश झा महिला महाविद्यालय सहरसा, बी. एन. एम. यू., मधेपुरा   DOI: 10.70650/rvimj.2026v3i10012   DOI URL: https://doi.org/10.70650/rvimj.2026v3i10012
Published Date: 10-01-2026 Issue: Vol. 3 No. 1 (2026): January 2026 Published Paper PDF: Download

सारांश: मौर्य साम्राज्य (लगभग 322 ई.पू. से 185 ई.पू.) प्राचीन भारत का पहला बड़ा एकीकृत साम्राज्य था, जिसकी स्थापना चंद्रगुप्त मौर्य ने की और जिसे चाणक्य (कौटिल्य) जैसे कुशल सलाहकार का समर्थन प्राप्त था। यह साम्राज्य अफगानिस्तान से लेकर दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों तक फैला हुआ था। मौर्यकालीन शासन व्यवस्था मुख्य रूप से केंद्रीकृत, नौकरशाही और कुशल थी, जो अर्थशास्त्र (कौटिल्य द्वारा रचित), मेगस्थनीज की इंडिका तथा अशोक के शिलालेखों जैसे स्रोतों से ज्ञात होती है। यह व्यवस्था न केवल विशाल साम्राज्य को नियंत्रित करने में सक्षम थी, बल्कि राजस्व संग्रह, न्याय, सैन्य संगठन और जनकल्याण पर भी जोर देती थी। चंद्रगुप्त काल में यह अधिक केंद्रीकृत और सुरक्षा-उन्मुख थी, जबकि अशोक काल में धम्म नीति के माध्यम से नैतिक और कल्याणकारी आयाम जुड़ गया। विश्लेषणात्मक दृष्टि से, मौर्य शासन प्राचीन विश्व की अन्य साम्राज्यों (जैसे रोमन या फारसी) से तुलनीय था, लेकिन इसमें भारतीय दर्शन (दंडनीति और सप्तांग सिद्धांत) की अनूठी छाप थी।

मुख्य शब्द: प्राचीन, कौटिल्य, साम्राज्य, जनकल्याण, कल्याणकारी।


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