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सशक्त जनमाध्यम के रूप में उभरता सामुदायिक रेडियोः एक अध्ययन

Author(s): सुमन प्रकाश, शोधार्थी, राजनीतिक विज्ञान, स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड ह्यूमैनिटीज, आईआईएफटी विश्वविद्यालय (उ.प्र.) डॉ. अतीकुर्रहमान, एसोसिएट प्रोफेसर, राजनीतिक विज्ञान, विभागाध्यक्ष, स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड ह्यूमैनिटीज, आईआईएफटी विश्वविद्यालय (उ.प्र.)   DOI: 10.70650/rvimj.2026v3i2007   DOI URL: https://doi.org/10.70650/rvimj.2026v3i2007
Published Date: 03-02-2026 Issue: Vol. 3 No. 2 (2026): February 2026 Published Paper PDF: Download

सारांश: गोमुख–उत्तरकाशी भागीरथी घाटी हिमालयी पारिस्थितिकी की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र है। इस क्षेत्र में गंगा नदी का उद्गम होने के कारण इसकी पर्यावरणीय सुरक्षा न केवल स्थानीय बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी महत्वपूर्ण है। वर्तमान में क्षेत्र कई प्रकार की पर्यावरणीय संरक्षण प्रक्रियाओं, 1986 पर्यावरण संरक्षण अधिनियम और हिमालयन डेवलपमेंट पॉलिसी जैसी नीतियों से इस क्षेत्र की पारिस्थितिकी और स्थानीय समुदायों के जीवन के अधिकार की रक्षा के लिए आवश्यक है। स्थानीय प्रशासन और वन विभाग ने पर्यावरण निगरानी, अवैध निर्माण रोकथाम और विकास परियोजनाओं के पर्यावरण मूल्यांकन की दिशा में निश्चित कदम लिए हैं। हालांकि, पर्यटन दबाव, जलवायु परिवर्तनजन्य, अवैध निर्माण और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियाँ पर्यावरण संतुलन और जीवन के अधिकार को प्रभावित कर रही हैं। 2013 की उत्तराखंड आपदा ने इस क्षेत्र के संरक्षण में स्थानीय समुदायों पर आधारित विकास के महत्व को उजागर किया। अध्ययन यह सुझाव देता है कि सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण सुनिश्चित करने के लिए नीति सुधार, सामुदायिक भागीदारी, प्रभावी निगरानी और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से योजना बनाना अनिवार्य है। ये केवल इस संवेदनशील उत्तरकाशी भागीरथी घाटी में प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और स्थानीय जीवन के अधिकार की संवैधानिक सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।

मुख्य शब्द: पर्यावरण संरक्षण, इको–सेंसिटिव जोन, गोमुख–उत्तरकाशी, भागीरथी घाटी, जीवन के अधिकार.


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