आदिवासी शिक्षा का सशक्तिकरणः सरकारी योजनाओं और राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का योगदान
Abstract: भारत की कुल जनसंख्या का लगभग 8.6% हिस्सा अनुसूचित जनजातियों से संबंधित है (जनगणना, 2011)। इन समुदायों का एक बड़ा वर्ग आज भी सामाजिक-आर्थिक विकास की मुख्यधारा से अलग है। विशेषकर महिलाओं की शिक्षा की स्थिति चिंताजनक रही है। जनगणना 2011 के आँकड़ों के अनुसार अनुसूचित जनजातियों की औसत साक्षरता दर 59% थी, जिसमें पुरुषों की दर 68.5% जबकि महिलाओं की केवल 49.4% रही। यह असमानता दर्शाती है कि आदिवासी महिलाओं को शिक्षा के समान अवसर उपलब्ध कराना आज भी एक प्रमुख चुनौती है। वंचित वर्गों के लिए शिक्षा सबसे प्रभावशाली सशक्तिकरण का साधन है। इसी दृष्टि से सरकार ने कई योजनाएँ चलाईंकृजैसे एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय (EMRS), आश्रम शालाएँ, जनजातीय उप-योजना (TSP), छात्रवृत्ति योजनाएँ तथा डिजिटल शिक्षा पहलेंकृजिनसे आदिवासी विशेषकर बालिकाओं की शिक्षा में सहभागिता बढ़ी है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) ने भी आदिवासी शिक्षा को नए आयाम दिए हैं। इसमें मातृभाषा आधारित प्रारंभिक शिक्षा, स्थानीय संस्कृति पर आधारित पाठ्यचर्या, लैंगिक समानता को बढ़ावा और डिजिटल संसाधनों की सुलभता जैसे प्रावधान शामिल हैं। इन प्रयासों ने न केवल साक्षरता दर में सुधार लाया है बल्कि महिलाओं की भागीदारी, रोजगार अवसर और सामाजिक सशक्तिकरण की संभावनाएँ भी बढ़ाई हैं। हालाँकि, उच्च ड्रॉपआउट दर, डिजिटल असमानता और उच्च शिक्षा तक सीमित पहुँच जैसी चुनौतियाँ अभी भी बनी हुई हैं। इसलिए आवश्यक है कि भविष्य की नीतियाँ इन मुद्दों पर और गहन कार्य करें, ताकि अनुसूचित जनजातियाँ विशेषकर महिलाएँ गुणवत्तापूर्ण, समान और सतत शिक्षा से पूर्णतः लाभान्वित हो सकें।
मुख्य शब्द: अनुसूचित जनजाति, शिक्षा नीति 2020, महिला सशक्तिकरण, डिजिटल असमानता, ड्रॉपआउट दर.